घटती आस्था, टूटती परंपराएं: देव संस्कृति पर गहराता संकट

देव परंपरा से घटता जुड़ाव, देव संस्कृति पर संकट की आहट

ब्यूरो, दैनिक हिमाचल न्यूज- अर्की उपमण्डल के माँजू गांव स्थित प्राचीन श्री देव कुरगन मंदिर परिसर में बीती रात भाद्रपद मास की अघोरा चतुर्दशी, जिसे स्थानीय बोली में डगयाली कहा जाता है, परंपरागत रूप से निभाई गई। लगभग 1500 की आबादी वाले इस गांव से मात्र 20-30 लोग ही मंदिर परिसर पहुंचे। यह स्थिति इस तथ्य को उजागर करती है कि कभी आस्था और सामूहिकता का प्रतीक रही यह परंपरा अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।

देवता के प्रमुख गुर वेद प्रकाश और रमेश का कहना है कि पहले इस मंदिर में केवल स्थानीय ही नहीं बल्कि आस-पास की पंचायतों से भी बड़ी संख्या में लोग जुटते थे। श्रद्धालु पूरी रात देवधाम में हाजिरी देकर सुबह आशीर्वाद लेकर ही अपने घर लौटते थे। लेकिन अब यह परंपरा केवल कुछ बुजुर्गों तक सीमित होकर रह गई है।

नकारात्मक शक्तियों से बचाव के लिए घरों पर तिमीर या भेखली की टहनियां लगाने की परंपरा और कुल पुरोहितों द्वारा यजमानों को अभिमंत्रित सरसों बांटने की मान्यता भी अब कुछ ही घरों में निभाई जाती है। वयोवृद्ध लक्ष्मीचंद चौहान, टेकचंद चौहान, किरपराम, रमेश भार्गव और नरेश भार्गव सहित अन्य का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में डगयाली जैसी परंपराएं केवल किताबों और कहानियों तक सीमित होकर रह जाएंगी।

चिंता की बात यह भी है कि आज का युवा वर्ग इस परंपरा को समझने और निभाने के बजाय सोशल मीडिया पर डगयाली से जुड़े मीम और चुटकुले साझा करने तक ही सीमित हो गया है। इस कारण इसके पीछे छिपी पीढ़ियों पुरानी आस्था और महत्व पर चर्चा लगभग समाप्त हो गई है।

प्रदेश में हाल के वर्षों में बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं और उनका भयावह असर कहीं न कहीं हमें चेतावनी देते हैं कि जब समाज अपनी देव संस्कृति और परंपराओं से दूरी बनाता है, तो प्रकृति भी असंतुलित होकर रौद्र रूप दिखाती है। आपदाएं केवल विनाश नहीं लातीं, बल्कि संदेश भी देती हैं कि यदि समाज समय रहते नहीं जागा तो परिणाम और गंभीर होंगे।

अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी, इन परंपराओं को केवल औपचारिकता न समझे बल्कि इन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति से जुड़ाव का माध्यम मानकर निभाए। डगयाली जैसी परंपराएं मात्र रिवाज़ नहीं, बल्कि हमारी देव संस्कृति और जीवन मूल्यों की जड़ हैं। इन्हें जीवित रखना ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संतुलित भविष्य देने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

LIC

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