ब्यूरो, दैनिक हिमाचल न्यूज- हरियाली तीज के पावन पर्व को लेकर आचार्य लोकेश ने व्रत कथा का महत्व बताते हुए कहा कि यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार हरियाली तीज का व्रत करने से कुंवारी कन्याओं को मनोवांछित एवं सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है, जबकि सुहागिन महिलाओं के दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि और प्रेम बना रहता है।

आचार्य लोकेश ने बताया कि देवी पार्वती अपने पूर्वजन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री सती थीं। उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में स्वीकार किया था। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने पर माता सती ने यज्ञ कुंड में देह त्याग दी। इसके बाद उन्होंने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेकर भगवान शिव को पुनः पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की।

उन्होंने बताया कि सावन के दौरान माता पार्वती ने मिट्टी से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की और तपस्या में लीन रहीं। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने हरियाली तीज के दिन उन्हें दर्शन दिए और पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इसी कारण हरियाली तीज को भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का पावन पर्व माना जाता है।

आचार्य लोकेश के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती के आग्रह पर वरदान दिया कि जो कुंवारी कन्याएं श्रद्धापूर्वक हरियाली तीज का व्रत कर शिव-पार्वती की पूजा करेंगी, उन्हें मनोकामना के अनुसार सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होगी। वहीं, सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत दांपत्य जीवन में प्रेम, सुख और सौभाग्य की कामना का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से हरियाली तीज के अवसर पर श्रद्धा और भक्ति भाव से भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने का आह्वान किया।

