ब्यूरो,दैनिक हिमाचल न्यूज़- स्वर्गीय एल.आर. भारद्वाज की चतुर्थ पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में भारद्वाज परिवार की ओर से कुनिहार में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के पांचवें दिन श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। स्थानीय क्षेत्र के अलावा आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे। कथा व्यास आचार्य प्रेम दत्त महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अवतार, जन्मोत्सव, गोकुल आगमन तथा बाल लीलाओं का अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति और मानव जीवन के आदर्शों का संदेश दिया।

आचार्य प्रेम दत्त ने कहा कि जब पृथ्वी पर अधर्म, अत्याचार और पाप का बोझ बढ़ गया तथा अत्याचारी राजा कंस के अत्याचारों से समस्त प्रजा भयभीत थी, तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प लिया। उन्होंने बताया कि राजा कंस ने अपनी बहन देवकी और उनके पति वासुदेव को कारागार में इसलिए बंद कर रखा था क्योंकि आकाशवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र ही कंस का वध करेगा। इसी भय से कंस ने देवकी की सात संतानों का वध कर दिया।

कथा व्यास ने आगे कहा कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि के शुभ क्षणों में भगवान श्रीकृष्ण ने कारागार में दिव्य स्वरूप धारण कर जन्म लिया। भगवान के प्रकट होते ही कारागार के बंधन स्वयं खुल गए, पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए और चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। भगवान की आज्ञा से वासुदेव जी नवजात श्रीकृष्ण को सूप में लेकर मथुरा से गोकुल की ओर चल पड़े। उस समय मूसलाधार वर्षा हो रही थी, लेकिन शेषनाग ने अपने फनों की छत्रछाया से भगवान की रक्षा की। उफनती यमुना भी भगवान के चरण स्पर्श से शांत हो गई और वासुदेव जी सकुशल गोकुल पहुंच गए।

आचार्य ने बताया कि गोकुल में उसी समय नंद बाबा की पत्नी माता यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था। वासुदेव जी ने श्रीकृष्ण को यशोदा मैया के पास सुलाकर कन्या को अपने साथ मथुरा ले आए। जब कंस ने उस कन्या को मारने का प्रयास किया तो वह योगमाया के रूप में आकाश में प्रकट हुई और कंस को चेतावनी दी कि उसका काल जन्म ले चुका है। इस प्रसंग का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

कथा के दौरान आचार्य प्रेम दत्त जी ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का भी अत्यंत रोचक एवं विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने पूतना वध, शकटासुर वध, तृणावर्त का संहार, माखन चोरी, गोप-गोपियों के साथ बाल सुलभ क्रीड़ाएं, उखल बंधन, यमल-अर्जुन वृक्षों का उद्धार तथा कालिय नाग दमन जैसे प्रसंगों को बड़े ही भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला केवल चमत्कार नहीं, बल्कि मानव जीवन को सत्य, प्रेम, करुणा, सेवा, निष्काम कर्म और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

आचार्य ने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि भगवान सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान का स्मरण करता है, उसके जीवन के सभी संकट स्वतः दूर होने लगते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने जीवन में धर्म, संस्कार, सत्य और सेवा की भावना अपनाने का आह्वान किया तथा नियमित रूप से श्रीमद्भागवत का श्रवण और भगवान के नाम का स्मरण करने की प्रेरणा दी।

कथा के दौरान पूरा पंडाल भक्ति रस में डूबा रहा। श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव और बाल लीलाओं के प्रसंग सुनकर भाव-विभोर हो गए। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के जयघोष के साथ वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

कथा उपरांत भारद्वाज परिवार की ओर से प्रतिदिन की भांति सभी श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ अर्जित किया। इस अवसर पर जानकी देवी, पंकज भारद्वाज, संगीता भारद्वाज, सुनीता भारद्वाज, राकेश भारद्वाज, पूनम भारद्वाज, इंदर पाल शर्मा, रक्षा शर्मा, अरविंद जोशी, मनमोहन शर्मा, राजीव गर्ग, मुकेश शर्मा सहित नगर के अनेक गणमान्य नागरिक एवं आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा का आयोजन प्रतिदिन श्रद्धा एवं भक्ति के साथ जारी है और श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचकर धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं।


